आज सुबह से हाथ-पैर में जान ही नहीं थी, त्वचा शांत थी फिर भी उठने का मन नहीं हुआ, बस सोचती रही शुरू कहाँ से करूं।
फिर हिम्मत करके घर के आसपास थोड़ी देर टहल आई (असली में आलस भी था थोड़ा), तेज़ चलना तो दूर की बात थी।
आते ही आटा गूंधने बैठ गई, ब्रेड बनाने का मन था, हाथ हिलते रहे तो लगा यही आज का व्यायाम हो गया!
आटा फूलने के लिए रखा तो बीच में हल्की स्ट्रेचिंग भी कर ली, कंधे और हाथ ही सही।
काम आजकल कभी ज़्यादा तो कभी बिल्कुल नहीं, आज खाली दिन था इसलिए यह सब हो पाया, वरना क्लाइंट कॉल में ही निकल जाता।
शाम को हिसाब की कॉपी फिर से खोली, बहुत दिन से बंद पड़ी थी।
छोटा दिन था, पर कुछ तो हुआ, यही काफी है आज के लिए।
