आज सुबह उठते ही लगा, हाथ-पैर में जान ही नहीं बची।
फिर भी बिस्तर पर बैठे-बैठे गर्दन घुमाई, कंधे थोड़े हिलाए, बस इतना ही हो पाया।
काम आज हल्का था, क्लाइंट की तरफ से कोई कॉल नहीं आई, तो थोड़ी फुर्सत मिली, मतलब पूरा दिन खाली जैसा लगा।
– कुछ दिन से बंद पड़ी हिसाब की कॉपी निकाली, थोड़ा-बहुत लिखा
– ओवन में ब्रेड डाल दी, बीच-बीच में बैठकर ही देखती रही
– कोहनी के पास हल्की खुजली महसूस हुई, क्रीम लगाई
मौसम भी ऐसा है कि रात होते-होते हवा ठंडी हो जाती है, त्वचा और सूखने लगती है।
मन में यही चलता रहा कि पहले क्या करूं, कहाँ से पकड़ूं, समझ नहीं आया, फिर भी हिम्मत करके इतना कर लिया।
थोड़ा ही सही, कुछ तो हिला आज, यही सोचकर मन हल्का हुआ।
लिखते-लिखते लंबा हो गया, माफ़ करना साथियों।
