दूसरा दिन है आज भी लिखने बैठी हूं। दुकान पर सुबह से शाम तक बैठे-बैठे कमर फिर अकड़ गई, कुर्सी वैसी ही पुरानी है, बदलने का सोच रही हूं बस अभी तक हुआ नहीं।

शाम को दुकान बंद करके घर आई तो सबसे पहले नहाकर मॉइश्चराइज़र लगाया, गर्दन और कोहनी के पास हल्का रूखापन था वो ठीक लगा। बारिश अभी पूरी तरह गई नहीं है इस तरफ, हवा में नमी है फिर भी त्वचा खिंची-खिंची सी रहती है, समझ नहीं आता ऐसा क्यों होता है।
रात में बहुत दिन बाद बही-खाता निकालकर बैठी। महीनों से बंद पड़ा था, आज थोड़ा-थोड़ा भरा। लिखते-लिखते कंधे और पीठ दोनों में खिंचाव महसूस हुआ, बीच में उठकर थोड़ा टहलना पड़ा वरना अकड़न और बढ़ जाती।
आज किया –
– सुबह गुनगुने पानी से नहाई, साबुन हल्का वाला ही लगाया
– दुकान में बीच-बीच में उठकर खड़ी हुई, ज़्यादा देर बैठी नहीं रहने की कोशिश की
– रात को क्रीम लगाकर सोई
नहीं किया –
– टहलने नहीं जा पाई, शाम दुकान बंद करते-करते देर हो गई
– रोटी आज नहीं सेंकी, थकान लग रही थी
बस इतना ही आज। कल फिर से लिखूंगी।
