तीसरा दिन है आज। दुकान में सुबह से शाम तक बैठे रहना पड़ा, ग्राहक कम थे तो कुर्सी पर देर तक बैठी रही, कमर अब भी थोड़ी अकड़ी हुई लगती है। बीच में उठकर थोड़ा टहली, हाथ-पैर हिलाए, फिर वापस बैठ गई।
शाम को घर आकर रोटी की जगह इस बार ब्रेड सेंकी, आटा गूंधते वक्त हाथ बार-बार धोने पड़े, आटा सूखा तो उंगलियों के बीच हल्की जलन शुरू हो गई। ओवन से निकालते ही हाथ धोए और क्रीम लगाई, कलाई पर अभी भी हल्की लाली बाकी है पर खुजली पहले से कम है।
रात को बहुत दिनों बाद हिसाब की कॉपी निकाली, दुकान का और घर का खर्च अलग-अलग लिखा। बीच-बीच में हाथ रुक जाता है, पर आज लिखना पूरा किया।
