आज दुकान में सुबह से देर तक बैठे रहना पड़ा। ग्राहक कम थे तो कुर्सी पर झुक कर बैठे रहे, टेबल पर हाथ टिकाए हुए घंटों निकल गए। दोपहर होते होते गर्दन के पीछे कॉलर गीला हो गया था, वहीं वो पुरानी जलन फिर शुरू हो गई। थोड़ी देर टाल दिया काम में लगे रहे, फिर लगा आज लिख कर रखना ठीक रहेगा, बहुत दिन हो गए थे कुछ यहाँ लिखे बिना।
शाम को दुकान बंद करके घर आते ही सीधे धो लिया, हल्के हाथ से पोंछा, फिर लोशन लगाया। इस बार खुजाया नहीं, बस हाथ रखे रखा जब तक जलन थोड़ी कम नहीं हुई। पहले होता तो तुरंत नाखून वहीं चला जाता, आज नहीं गया, बस सहा।
– सुबह दुकान खोली, सारा दिन झुक कर बैठे रहे
– दोपहर कॉलर गीला, गर्दन में जलन शुरू हुई
– शाम को धोया, लोशन लगाया, खुजाया नहीं
– रात को हल्का सूती कपड़ा पहना सोने के लिए
दुकान से लौट कर घर में ब्रेड के लिए डो भी गूंध लिया। आटे में हाथ लगा हुआ था तब ध्यान रहा कि हाथ गर्दन तक न जाए। डो को ढक कर रख दिया फूलने के लिए, उस बीच बैठ कर पुराना हिसाब वाला खाता निकाल लिया, जो बहुत दिन से बंद पड़ा था। कुछ पन्ने भरे, पूरा हिसाब नहीं हुआ, पर आज इतना ही ठीक लगा।
बैठने का तरीका ही असल वजह लग रहा है, कॉलर के घिसने से ज्यादा। दुकान की कुर्सी बदलनी पड़ेगी शायद, या बीच बीच में उठ कर थोड़ा टहलना होगा।
