आज सुबह दुकान खोलते ही कुर्सी पर बैठ गया, जी। ग्राहक कम थे तो उठने का मन ही नहीं हुआ, करीब 2 घंटे ऐसे ही बैठा रहा। दुकान में सुबह से शाम तक अकेले ही बैठना पड़ता है, बदलने वाला कोई नहीं, तो आदत में बैठे रहना आ ही जाता है।
दोपहर में पीठ भारी लगने लगी। उठकर थोड़ा टहला, कंधे घुमाए, फिर दुकान का काम करने वापस बैठ गया — वही पुरानी आदत लौट आई।
शाम को दुकान बंद करके घर आया, आटा गूंधा और ब्रेड सेंकी। ओवन के सामने खड़े रहकर काम करने से पीठ को थोड़ा आराम मिला, ये बात आज फिर समझ में आई।

रात 9 बजे हिसाब की किताब फिर से खोली। पहले रोज लिखता था, कुछ महीने से छोड़ दिया था। आज से फिर शुरू किया, कितने दिन चलेगी ये देखना है।
आज रखा –
– बैठने के बीच 2 बार उठना
– शाम को खड़े होकर काम करना
आज नहीं हो पाया –
– दोपहर वाली सीधी बैठक, वो फिर टूट गई
हिसाब की किताब अब टेबल पर ही रखी रहेगी।
