दुकान में आज सुबह से टाइमर लगाया, हर घंटे उठने के लिए। फोन में अलार्म सेट किया, काउंटर पर बैठे-बैठे भूल ही जाता हूं कि कब से नहीं उठा।
सुबह 11 बजे तक 3 बार उठा, टहला, गर्दन घुमाई। दोपहर में ग्राहक ज्यादा आए तो टाइमर बजता रहा पर उठ नहीं पाया, बस बैठे-बैठे कंधे हिलाए।
शाम को दुकान बंद करने के बाद ब्रेड का आटा गूंधा, कलाई सीधी रखने की कोशिश की। हिसाब की कॉपी भी आज खड़े होकर, काउंटर पर रखकर लिखी – बैठकर लिखने से कमर जो अकड़ती है, वो आज नहीं हुई।
रात को सोचा, टाइमर लगाना आसान है, बजने पर उठना अलग बात है। आज का स्कोर – 3 बार सही, बाकी समय भूल गया।
