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शरीर का समय ›रोज़ की दिनचर्या

टाइमर का दूसरा दिन

टाइमर वाली बात को आज 2 दिन हो गए। कल से दुकान में हर घंटे अलार्म बजा रखा है, बजते ही उठकर दो-चार कदम चलती हूं। आज सुबह से शाम तक कुल 6 बार उठी, कल से एक बार ज़्यादा। पहले घंटों बैठे रहने से पीठ पूरी तरह जकड़ जाती थी, आज उतना नहीं हुआ।

शाम को दुकान बंद करके घर आई, रोज़ की तरह ब्रेड के लिए आटा गूंधा। आज हाथ में पहले जैसी जलन नहीं हुई, बस हल्की थकान थी। ब्रेड बनकर निकलने तक इंतज़ार किया, घर में खुशबू भर गई।

रात में गैस-बिजली का हिसाब लिखने बैठी तो फिर झुकने लगी थी, याद आया तो सीधी हो गई। हिसाब की कॉपी भी नई शुरू की है, पुरानी महीनों से छूटी हुई थी, अब रोज़ थोड़ा-थोड़ा भरती हूं। बहुत देर तक टिकना मुश्किल है, बार-बार भूल जाती हूं।

कल भी यही टाइमर चलाना है, देखते हैं कंधा कैसा रहता है।

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