दुकान खोलने से पहले आज फिर कमर को हल्के से सहला लिया। दिवाली की सफ़ाई के बाद से यह दूसरा दिन है, कुर्सी से उठते वक़्त अब पहले जैसे सीधे झटके से नहीं उठती।
आज जो किया वो यूं रहा –
– कुर्सी पर पीठ सीधी करके बैठी, हिसाब की कॉपी गोद में नहीं बल्कि मेज़ पर रखकर लिखी
– आटा नहीं गूंधा, ब्रेड वाला काम कल पर टाल दिया, ज़ोर पड़ने का डर था
– ग्राहक के बीच-बीच में उठकर थोड़ा टहल भी लिया
– शाम की वॉक भी आज थोड़ी छोटी रखी, पूरा चक्कर लगाने की जगह बीच से ही लौट आई
शाम को गरम कपड़े से सेंक किया, अभी हल्का आराम लग रहा है। अकड़न पूरी तरह नहीं गई है पर कल से थोड़ा फ़र्क़ ज़रूर लग रहा है।
दुकान में बैठने का पोश्चर बदलना इतना आसान नहीं, पुरानी आदत बार-बार खींच लाती है। फिर भी आज जितना ध्यान रखा वो काफ़ी लगा। कल सुबह फिर वही तरीक़ा अपनाऊंगी, देखते हैं कितना टिकता है।
