आज सुबह दुकान खोलने से पहले फिर ब्रेड बनाई, बीच में कुछ दिन यह भी छूट गया था। पहले नीचे टेबल पर झुककर आटा गूंधती थी, आज घर से ऊँचा स्टूल निकाला और उस पर बैठकर गूंधा, कमर इतनी नहीं झुकी और कलाई भी सीधी रही, कंधे थोड़े भारी लगे पर कमर में वो खिंचाव नहीं आया जो पहले हर बार आता था।
ब्रेड ओवन में डालकर गल्ले पर आई, हिसाब की कॉपी भी तिरछी टिकाकर रखी जैसे अब रोज़ करती हूं, बीच-बीच में ग्राहक आते-जाते रहे पर टाइमर का ध्यान बना रहा, कल जैसे बिल्कुल नहीं भूली।
आज जो किया –
– आटा स्टूल पर बैठकर गूंधा
– ओवन का टाइमर समय पर देखा
– गल्ले पर हिसाब तिरछी कॉपी में लिखा
– शाम दुकान बंद करने से पहले थोड़ी देर कमर सीधी करके बैठी
ब्रेड अच्छी निकली, खुशबू पूरी दुकान में फैल गई, पुरानी ग्राहक ने पूछा आज क्या बना रही हूं तो बता दिया। घर के हिसाब की किताब भी आज रात से फिर लिखना शुरू करूंगी, दुकान के साथ-साथ वो भी बीच में छूट गया था। कमर को लेकर अब पहले जैसा डर नहीं लगता, बस ध्यान रखना पड़ता है।
