आज सुबह दुकान खोलते ही फ़ोन में अलार्म लगा दिया, हर घंटे पर उठने के लिए। पहले हिसाब लिखने बैठती थी तो घंटों पता ही नहीं चलता था, कमर अकड़ जाती थी।
अलार्म बजा तो उठी, थोड़ी देर खड़ी रही, फिर वापस बैठ गई। बीच में ग्राहक आ गया और बात में उलझ गई, उस बार उठना छूट गया… बाकी बार याद रहा।
शाम को ब्रेड का आटा गूंधते वक्त भी वही महसूस हुआ, झुककर काम करने में कमर खिंचती है। स्टूल की ऊँचाई फिर से देखनी होगी।
हिसाब की डायरी आज बिखरी नहीं, साथ ही लिखी। धीरे-धीरे सब जम रहा है जी।
