काउंटर पर आज सुबह से हिसाब की किताब खड़े होकर ही निकाली। कल से जो नियम बना है, सोचा उसी को हिसाब में भी लगा कर देखूं।
किताब मेज के किनारे पर रखी, कलम हाथ में, पर लिखते वक़्त हाथ थोड़ा हिलता रहा – लाइन सीधी नहीं आई, मिटाकर फिर लिखना पड़ा। कमर को आराम तो मिला, ये सच है, बैठने वाली अकड़न आज बिलकुल नहीं हुई। पर हिसाब के काम में ध्यान चाहिए, खड़े रहकर वो ध्यान बँटता रहा जी।
बीच में आटा भी गूंधना था, वो स्टूल पर खड़े होकर जैसे हमेशा करती हूं, वो ठीक रहा। शाम को दुकान बंद करने के बाद वही तकिया निकाला, पर आज ज़्यादा देर उस पर बैठना नहीं पड़ा।

सोच रही हूं कल से हिसाब फिर बैठकर ही करूं, कुर्सी में तकिया लगाकर, और दुकान वाला खड़े रहने का नियम अलग से चलता रहे। हिसाब वाला नियम और दुकान वाला नियम साथ-साथ निभाना अभी थोड़ा मुश्किल लग रहा है।
