शिफ्टिंग की तैयारी में आज सामान समेट रही थी।
पुराने डिब्बे में एक मॉइस्चराइज़र की ट्यूब मिली, थोड़ी खाली, ढक्कन पर क्रीम जमी हुई।
वही देखकर याद आया कि रूटीन कब से (ढीला) पड़ गया है।
इस हफ्ते बारिश की नमी बढ़ गई है।
कोहनी और गर्दन पर वही पुरानी खुजली लौट आई है।
रात में नींद बीच में टूट जाती है, हाथ अपने आप वहीं चला जाता है।
दफ्तर में भी एसी लगातार चलता रहता है।
शाम होते-होते त्वचा खिंची-खिंची सी लगने लगती है।
बार-बार क्रीम लगानी पड़ रही है, अब डेस्क पर भी एक ट्यूब (हमेशा के लिए) रखनी होगी।
खाने में मसाला और डेयरी से दूर रहने की कोशिश जारी है।
पर त्यौहारों का मौसम है, घर में मिठाई और पकवान बन रहे हैं।
हर बार मना करना उतना आसान नहीं होता।
पति ने कहा कि “थोड़ा कम खा लिया कर, बाद में तकलीफ तुझे ही होगी।”
बात सही है, पर सामने रखी चीज़ छोड़ना भी आसान नहीं।
अगले हफ्ते डेस्क पर मॉइस्चराइज़र रखने की कोशिश करूंगी।
कम से कम हाथ खाली नहीं जाएगा।
