मौसम बदलते ही घर में रजाई-चादर निकालने का काम शुरू हो गया। पुरानी अलमारी से गद्दे के कवर और तकिए के गिलाफ निकाले तो साथ में धूल भी खूब निकली। शाम तक हाथ की खुजली फिर बढ़ गई थी।
रात को सोने से पहले हाथ धोकर [मॉइस्चराइज़र] लगाया, तब जाकर थोड़ी राहत मिली। बच्चों की चादरें भी बदलनी थीं इसलिए सारा काम अकेले ही निभाया। ऑफिस से लौटकर शाम में यही करना पड़ा, थकान ज़्यादा हो गई।
कोहनी के पास की त्वचा रूखी होकर हल्की फटने लगी है। इस पर ध्यान देना पड़ेगा।
बीच हफ्ते एक और शादी का कार्ड भी आ गया। अभी से सोच रही हूं कि उस दिन कौन सी आस्तीन वाली साड़ी पहनूं, दाग ज़्यादा न दिखें।
वीकेंड पर पास वाली पहाड़ी तक टहलने गई थी परिवार के साथ। हवा साफ थी, पसीना आया तो त्वचा में हल्की जलन हुई पर सह्य थी। लौटकर तुरंत नहाकर क्रीम लगाई, यह आदत अब बन गई है।
माँ ने फोन पर कहा- “नई चादर धोकर ही बिछाना, वरना खुजली और बढ़ेगी।” बात सही लगी।
अगले हफ्ते पहले धोकर तब बिछाऊंगी, धूल वाली दिक्कत शायद कम हो जाए।
