आज शाम काम से लौटते हुए मैंने रास्ता थोड़ा घुमाकर लिया।
फिल्म कैमरा बैग में पड़ा था, बहुत दिनों से हाथ ही नहीं लगाया था।
बच्चों को घर पर छोड़कर अकेले निकलना आजकल मुश्किल हो जाता है, फिर भी आज मौका बना लिया।
गली के मोड़ पर वही पुरानी दीवार है, रंग अब और उतर गया है, वहीं एक फ्रेम लिया।
काम का दबाव पिछले कुछ समय से काफी बढ़ गया है, रात को नींद भी देर से आती है, इसका असर शरीर पर भी दिखने लगा है।
ऐसे में कैमरा हाथ में लेकर चलना अजीब सा लगा, जैसे बहुत दिनों बाद अपने लिए कुछ किया हो।
रोल अभी पूरा नहीं भरा है, धीरे-धीरे भरूंगी, जल्दी नहीं है।
मेरे मामले में शायद यही छोटी सी आदत काफी है, बड़ा कुछ बदलने की सोच अभी नहीं है।
सब लोग अपने लिए भी थोड़ा समय निकालते रहिए।
