रोज़ रात सोने का समय थोड़ा-थोड़ा पीछे खिसकता जा रहा है। बच्चों को सुलाने के बाद भी दिमाग शांत नहीं होता, दफ्तर की कोई बात अचानक याद आ जाती है और हाथ फिर से मोबाइल की तरफ बढ़ जाता है।
हफ्तों से यही चल रहा था, सुबह उठना भारी लगता, चेहरे पर भी थकान दिखने लगी थी। जो शौक पहले राहत देता था, मोहल्ले में फिल्म कैमरे से घूमकर तस्वीरें लेना, वह भी अब बोझ जैसा लगने लगा है।
शायद यह सिर्फ मेरे साथ ऐसा हो, पर लग रहा था कि पहले नींद को ठीक करना ज़रूरी है, बाकी सब बाद में सुधरेगा।
अब एक छोटा नियम आज़मा रही हूं, बच्चों को सुलाने के बाद फोन दूसरे कमरे में रख देना, और पास में कोई किताब रख लेना।
पहले दिन बेचैनी हुई, बीच-बीच में उठकर फोन देखने का मन भी हुआ, फिर भी नींद कुछ जल्दी आ गई।
बहुत बड़ा लक्ष्य नहीं रखा है, बस देखना है कि यह आदत कितने दिन टिक पाती है।
अगर सबके पास सोने से पहले का अपना कोई तरीका हो, तो जानने में दिलचस्पी रहेगी।
