ऑफिस में लंच के समय थोड़ी देर बाहर टहलने की कोशिश शुरू की है।
काम का स्ट्रेस अब सीधा शरीर में दिखने लगा है, कंधे अकड़ जाते हैं और सुबह उठना भी भारी लगता है।
डेस्क से पूरी तरह उठकर बाहर जाना कोई बड़ा प्लान नहीं है, बस लंच के बाद थोड़ी देर बिल्डिंग के आसपास घूम आती हूं।
– फोन साथ नहीं ले जाती
– रास्ते में खास कुछ सोचती भी नहीं, बस चलती रहती हूं
– लौटकर डेस्क पर बैठने में थोड़ी हल्की लगती हूं
पहले हफ्ते हर दिन नहीं हो पाया, कभी मीटिंग लंबी खिंच गई तो छूट गया।
फिर भी जितने दिन हुआ, उतने दिन शाम तक थकान थोड़ी कम रही, ऐसा लगा।
एक दिन पुराना फिल्म कैमरा साथ ले गई थी, बिल्डिंग के पास वाली गली की एक फोटो खींची, वैसे ही, कोई खास वजह नहीं थी।
रात में सोने का टाइम भी इधर थोड़ा पीछे खिसक रहा है, वो अलग बात है, शायद उसी स्ट्रेस से जुड़ा हो।
अभी बस इतना ही कोशिश कर रही हूं, आगे कुछ और जोड़ूं या नहीं, अभी तय नहीं किया।
शायद औरों को भी दफ्तर के बीच ऐसा कुछ करने से फर्क पड़ता हो, पता नहीं।
