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जीवन का समय ›विकास योजना

[कला] शाम को कैमरा लेकर निकली

आज शाम बच्चों को सुलाने के बाद घर से थोड़ी दूर तक निकली।
पुराना कैमरा हाथ में था, रोल अभी आधा ही खर्च हुआ था।

गली के मोड़ पर वही पुरानी दीवार है जिस पर रंग उखड़ चुका है।
वहीं रुककर एक फ्रेम ले लिया। रोशनी हल्की धुंधली थी, पता नहीं निकलेगी भी या नहीं।

काम का बोझ आजकल शरीर में कहीं न कहीं जमा होता रहता है।
इसलिए ऐसे थोड़ी देर के लिए बाहर निकलना ठीक लगता है, कैमरा साथ हो तो और भी।

मेरे मामले में शायद यही तरीका काम करता है, हर किसी के लिए ऐसा हो यह ज़रूरी नहीं।

रोल खत्म होते ही धुलवाने ले जाऊंगी। तब पता चलेगा फ्रेम ठीक बना या नहीं।

फिलहाल यही आज का हिसाब था। कल शायद फिर उसी रास्ते से निकलूं।

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