पुरानी स्केचबुक हाथ लगी कल.
शिफ्टिंग का सामान समेटते हुए मिली, कॉलेज के टाइम की है.
कुछ पन्ने वहीं अधूरे रह गए थे.
रात को लैपटॉप बंद करके थोड़ी देर बैठी, उसी में फिर पेंसिल चलाई.
– हल्के स्केच, कुछ खास नहीं
– बस लाइनें, कोई प्लानिंग नहीं
– (दिमाग थोड़ी देर शांत हो जाता है)
काम का प्रेशर रहे या ना रहे, ये टाइम अलग निकालने की कोशिश कर रही हूं आजकल.
पूरी किताब भरने का इरादा नहीं, बस बीच-बीच में हाथ चलता रहे.
