आज दोपहर का काम निपटाकर बेटे का लैपटॉप लेकर बैठ गई, कल जो नौकरी वाला फॉर्म आधा भरा रह गया था वो पूरा करना था, देर तक स्क्रीन देखते-देखते आँखें दुखने लगीं, फिर भी जी कड़ा करके बैठी रही।

बीच में एक जगह फ़ाइल अपलोड करने को कहा गया, समझ ही नहीं आया, बेटे को बुलाना पड़ा, इतनी छोटी बात के लिए बार-बार पूछते हुए शर्म तो आई, पर उसने बिना झिड़के समझा दिया, वही सुकून की बात रही।
बीच में चाय बनानी थी, बर्तन भी रखने थे, फॉर्म वहीं छोड़कर उठना पड़ा, घर का काम निपटते-निपटते रात हो गई, सब सो गए तब जाकर बाकी हिस्सा भरा और भेज दिया।
भेजने के बाद जी सच में थोड़ा हल्का लगा! आगे क्या होगा पता नहीं, पर आज का हिस्सा पूरा हो गया, इतना ही काफी है।
