अगले महीने घर बदलना है।
3 दिन से सामान छांट रही हूं।
आज पुरानी किताबों वाला कार्टन खोला।
कॉलेज के नोट्स अभी तक रखे थे।
ज़्यादातर फेंक दिए, कुछ बच्चों के काम के निकले।
अकाउंट्स का काम करते-करते आदत हो गई है, हर चीज़ का हिसाब रखने की।
आज भी एक कॉपी में लिख लिया – क्या रखना है, क्या नहीं।
शाम को 2 बड़े बैग पुराने कपड़ों के भर दिए, देने के लिए।
अलमारी अब हल्की लग रही है।
पुरानी स्केचबुक भी मिलीं, कुछ अधूरी तस्वीरें थीं उनमें।
वो अलग रख दीं, फेंकने का मन नहीं हुआ।
रसोई का सामान अभी बाकी है।
वो सबसे मुश्किल हिस्सा लगता है।
बच्चों को बोला अपने खिलौने खुद छांटें।
दोनों ने मिलकर एक शाम में कर भी दिया।
सोचा था इसमें 2 दिन लगेंगे।
धीरे-धीरे सामान कम हो रहा है।
