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जीवन का समय ›सीख की नोटबुक

वेलनेस सेशन में एक लाइन याद रह गई

पिछले हफ़्ते ऑफिस की वेलनेस सेशन में डॉक्टर ने एक बात कही जो अभी तक दिमाग़ में अटकी हुई है।

bench, city, empty

मैंने अब तक यही सोचा था कि स्ट्रेस कम करने के लिए कोई शौक होना काफ़ी है। मेरे केस में वो फ़िल्म कैमरा है, वीकेंड पर अकेले मोहल्ले में निकल जाती हूं, कुछ फ़ोटो खींच लेती हूं, मन हल्का हो जाता है।

पर डॉक्टर ने कहा कि सोने से पहले के आख़िरी 40 मिनट अलग चीज़ हैं। स्किन का रिपेयर नींद के शुरुआती हिस्से में सबसे ज़्यादा होता है, और उस वक़्त दिमाग़ अगर फ़ोन या काम में उलझा रहे तो नींद के घंटे पूरे दिखने पर भी रिपेयर ठीक से नहीं होता।

मेरा मामला शायद औरों से अलग हो। दोनों बच्चों को सुलाने के बाद जो थोड़ा-सा अकेला वक़्त मिलता है, वही मैं फ़ोन में निकाल देती थी। 11 बजे की जगह धीरे-धीरे 12:30 तक खिंचता गया, पता ही नहीं चला।

तो पिछले 9 दिन से एक छोटा बदलाव कर रही हूं। बच्चों को सुलाने के बाद फ़ोन दूसरे कमरे में रख देती हूं, पास सिर्फ़ किताब रखती हूं।

नतीजा बड़ा नहीं है, बस गाल पर जो हल्की लालिमा सुबह दिखती थी वो इन दिनों थोड़ी कम लग रही है। पक्का नहीं कह सकती कि यही वजह है, पर 9 दिन में इतना फ़र्क़ दिखना काफ़ी है मेरे लिए।

किसी और का भी सोने से पहले वाला आधा घंटा ऐसे ही निकल जाता है क्या।

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