काम कभी एक साथ बहुत सारा आता है, कभी दिन भर कुछ नहीं आता। इसी उतार-चढ़ाव में बैठे रहने की आदत बहुत पक्की हो गई थी। लगा कि ताकत नहीं है, पर शुरू कहाँ से करूं समझ नहीं आ रहा था।
तो सोचा बड़ा प्लान बनाने की जगह बस एक छोटी सी बात आज़माती हूं। जब भी क्लाइंट का कॉल आता, बैठे-बैठे बात करने की जगह खड़े होकर बात करने लगी। शुरू में अजीब लगा, आवाज़ भी थोड़ी अलग निकलती थी शायद।
शुरू के दिनों में तो भूल ही जाती थी, बीच में बैठ जाती। पर धीरे-धीरे याद रहने लगा। खड़े रहते-रहते पैरों में जो थकान महसूस होती वो दिखा गई कि बैठे रहने की आदत ने कितना कुछ छीन लिया था, पहले तो पता ही नहीं था कि इतनी कमज़ोरी आ चुकी है।
घर पर ब्रेड बनाते वक्त भी अब यही करती हूं, आटा गूंधने के बाद जो इंतज़ार का समय होता है उसमें भी टेक लगाए बिना यूं ही खड़े रहने की कोशिश करती हूं।
काम कम रहने पर हिसाब की किताब निकाल के बैठ जाती थी, अब उसी वक्त टेबल के पास खड़े होकर हिसाब लिखने की कोशिश भी करने लगी हूं।
बड़ा कुछ नहीं किया, बस इतना ही। यहाँ के सभी लोगों को लंबा लिख दिया, माफ़ करना।

