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जीवन का समय ›सीख की नोटबुक

[अनुभव] सुबह ही करना तय किया

एक क्लास वीडियो में सुना था कि जब भी थोड़ा समय मिले तब एक्सरसाइज़ कर लेना चाहिए,
पर फ्रीलांस काम में ऐसा समय आता ही नहीं, कभी पूरा दिन खाली तो कभी रात तक काम में डूबी रहती हूं।

तो तय किया कि “समय मिलने” का इंतज़ार नहीं करूंगी,
उठते ही, नाश्ते से पहले, वो थोड़ी देर वाला हिस्सा कर लूंगी।

पहले लगा था सुबह-सुबह शरीर अकड़ा रहेगा तो हो नहीं पाएगा,
पर समझ आया दिन बीतने के साथ थकान और बहाने दोनों बढ़ते हैं, सुबह ऐसा नहीं होता।

अब काम का प्रेशर कितना भी हो, पता रहता है सुबह वाला हिस्सा हो चुका है,
मतलब बाकी दिन उसकी चिंता नहीं रहती।

हिसाब-किताब की नोटबुक में भी यही समझा था, रोज़ का रोज़ लिख लो तो आखिर में गिनना नहीं पड़ता,
यहां भी वैसा ही लगा।

ताकत अभी भी कम है, वो अलग बात है,
पर “कब करूं” वाला सवाल खत्म हो गया, इतना अच्छा लगा।

रुटीन को टाइम टेबल से नहीं, आदत से जोड़ना ही शायद असली तरीका है।

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