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जीवन का समय ›सीख की नोटबुक

आटे की थैली को वज़न बनाना सीखा

ताकत बिलकुल नहीं थी, कहां से शुरू करूं समझ ही नहीं आ रहा था।

एक वीडियो में सुना, शुरुआत में भारी डम्बल की ज़रूरत नहीं, घर में जो भी भारी चीज़ पड़ी हो उसी से काम चल जाता है।

घर पे ब्रेड बनाती हूं तो रसोई में आटे की थैली हमेशा पड़ी रहती है, वही उठाकर हाथ ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया।

शुरू में तो हाथ कांपने लगे थे, इतनी सी थैली में भी, ये देखकर खुद हैरान हो गई कि ताकत इतनी कम हो चुकी थी।

फ्रीलांस का काम है तो कभी इतना आ जाता है कि रात-रात भर बैठना पड़ता है, कभी हफ़्तों तक कुछ नहीं होता।

पहले काम ज़्यादा हो तो ये छूट जाता था, अब सोचा बीच में उठूं तभी थैली उठा लूं, बहुत देर नहीं लगती, काम वाला दिन भी छूटे नहीं।

हिसाब की डायरी भी 2 बारा लिखनी शुरू की है, सोचा इसे भी उसी डायरी में साथ लिख लूं, किस दिन उठाई किस दिन भूल गई।

मतलब कोई बड़ा प्लान नहीं बनाया, जो घर में पहले से था उसी से शुरुआत कर ली।

अभी हालत स्थिर है, ताकत बढ़ी है या नहीं ये अभी नहीं कह सकती, पर शुरुआत हो गई ये ही बहुत है।

साथियों, आज इतना ही लिखना था, लंबा हो गया शायद, माफ़ करना।

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