3 दिन से यही सोच रहा हूं। दुकान में सुबह से शाम तक अकेला बैठा रहता हूं, ग्राहक कम हों तो घंटों उसी कुर्सी से हिलता ही नहीं। कल कोहनी की सिलवट में फिर खुजली शुरू हुई, वही पुरानी जगह। ठीक हो चुकी थी, स्थिर चल रहा था, फिर भी।
रात को सोचा तो समझ आया, काहे कि बैठे रहने से वहां पसीना जमा रहता है, कपड़ा भी उसी जगह रगड़ता रहता है। खड़ा होता तो शायद हवा लग जाती। पहले इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया था।

आज से घड़ी सामने रख ली है। हर 40 मिनट में एक बार उठकर दुकान के बाहर तक जाता हूं, बस इतना ही। हिसाब की किताब भी 2 महीने बाद आज फिर खोली, उसी में समय और जगह दोनों लिख लिया।
छोटी बात है, पर लिख के रखना ज़रूरी लगा। भूल जाता हूं वरना।
