एक क्लास देख रही थी, उसमें कह रहे थे कि शरीर में ताकत बिलकुल न बचे तो सीधे वज़न या डम्बल की तरफ मत जाओ, पहले बस हिलना-डुलना शुरू करो।
क्लास वाले जी ने यही कहा—
“ताकत बिलकुल न हो तो पहले सिर्फ हिलना, वज़न बाद में।”
यह बात अटक गई, क्योंकि मेरे पास तो ताकत नाम की चीज़ है ही नहीं, और कहाँ से शुरू करूं यह भी समझ नहीं आता था।
फ्रीलांस का काम है तो कभी दिन भर लैपटॉप से चिपकी रहती हूँ, कभी हफ्तों कुछ काम ही नहीं आता, रूटीन बनाना मुश्किल हो जाता है।
तो सोचा जो थोड़ा-बहुत खाली समय मिलता है वहीं जोड़ लूं, मतलब घर पर आटा गूंथ कर रखती हूँ तो जब तक फूलता है, उतनी देर रसोई में खड़े-खड़े हल्का हिलना शुरू किया।
दीवार पकड़ कर थोड़ा नीचे-ऊपर होना, या बस पैर का वज़न इधर से उधर करना, बस इतना ही, बहुत हल्का सा।
हिसाब की कॉपी 2 बारा लिखना शुरू की थी, उसी के कोने में कब हिला वो भी टिक कर दिया, अलग डायरी बनाने का मन नहीं हुआ।
अजीब लगता था शुरू में, आटे के पास खड़े होकर यूं हिलना, पर कुछ दिन में आदत जैसी बन गई, और थकान भी उतनी नहीं लगी जितना सोचा था।
पता नहीं यह सबके साथ होता है क्या, या मेरे साथ ही ऐसा हुआ।
साथियों को भी बताना चाहती थी इसलिए लिख दिया, लंबा हो गया तो माफ़ करना।
