पिछले हफ्ते एक वीडियो में सुना कि गल्ले पर घंटों बैठने वालों के लिए घुटने से थोड़ा ऊंचा कूल्हा होना चाहिए, पैर पूरी तरह ज़मीन पर टिके हों। मेरी दुकान की कुर्सी पुरानी है, ऊंचाई कम है, तो घुटने कूल्हे से ऊपर उठे रहते थे। सुनते ही समझ आया कि पीठ के नीचे जो अकड़न रहती थी, वजह यही थी।
अगले दिन कुर्सी के नीचे लकड़ी का एक टुकड़ा रखकर करीब 5 सेंटीमीटर ऊंचा किया। बस इतना करने से फर्क साफ महसूस हुआ!
जो हिसाब-किताब की डायरी मैंने फिर से शुरू की है, उसे रात में गल्ला बंद करके खोलता हूं। वहां भी वही गलती दोहराता था – झुककर घंटों लिखता रहता था। अब मोबाइल में 50 मिनट का टाइमर लगा दिया है, बजते ही उठकर थोड़ा टहलता हूं।
सीखी बातें यहां लिख देता हूं –
– कूल्हा घुटने से थोड़ा ऊपर, पैर पूरे ज़मीन पर
– कुर्सी नीची हो तो नीचे कुछ रखकर ऊंचा करें
– लगातार बैठने का काम हो तो टाइमर ज़रूरी है
पहले कंधे और गर्दन के आसपास जो अकड़न और खुजली जैसी महसूस होती थी, अब वो पहले से हल्की लगती है। रोटी गूंथते वक्त भी अब कोहनी की पोज़िशन पर ध्यान देने लगा हूं, वो अलग विषय है, फिर कभी लिखूंगा।
