आज दुकान पर बैठे-बैठे फिर वही पुरानी जगह खुजलाने लगी, कोहनी के अंदर वाला हिस्सा, जहाँ हाथ घंटों टेबल पर टिका रहता है।
पिछले कुछ समय से हालत ठीक ही चल रही थी, पर गल्ले पर बैठकर काम करते वक्त लगातार टिकी रहने वाली त्वचा पर यही दिक्कत बार-बार लौट आती है।
कुछ दिन पहले किसी क्लास का वीडियो देखा था, लंबे समय बैठकर काम करने वालों की त्वचा को लेकर। उसमें बताया कि सख्त टेबल या कुर्सी की सतह पर त्वचा का सीधा घिसना ही असल तकलीफ की जड़ होती है, और बीच-बीच में जगह बदलना जरूरी है।
आज वही आज़माया। रसोई का पुराना तौलिया मोड़कर टेबल के उस कोने पर बिछा दिया जहाँ कोहनी टिकती है। ग्राहक न हों तब जितनी बार भी मौका मिला, उठकर कंधे हिला लिए, बैठे ही रहने के बजाय।
घर पर इन दिनों ब्रेड बनाना भी चल रहा है, आटा गूंधते वक्त हाथ लगातार हिलते रहते हैं। उस दिन के बाद कंधे और बांह की अकड़न कम महसूस हुई, गल्ले पर सीधा बैठे रहने वाले दिनों के मुकाबले।
हिसाब की डायरी फिर से लिखनी शुरू की है, तो उसी के हाशिये में आज छोटी लाइन जोड़ दी, तौलिया बिछाया और बीच-बीच में उठा, याद रखने के लिए। छोटी बात है, पर आज के लिए इतना ही काफी लग रहा है।
