रात को गल्ला बंद करने के बाद हिसाब लिखने बैठी तो लैपटॉप नीचे मेज़ पर वैसा ही रखा था, सिर झुकाकर टाइप करते-करते गर्दन में फिर खिंचाव-सा लगा। उसी वक़्त मोबाइल पर एक रील दिख गई, जिसमें कोई बता रहा था—
“स्क्रीन की ऊपरी लाइन हमेशा आँखों की सीध में रखो, नीचे झुककर मत देखो”
बात तो पहले भी कहीं सुनी थी, मगर उस रात 10 बजे जब फिर गर्दन भारी हो गई तो लगा आज आज़मा के देखते हैं।
दुकान में पीछे रखे 2 पुराने ब्रेड टिन और एक मोटी रेसिपी वाली किताब उठाकर लैपटॉप के नीचे रख दी। ऊँचाई ज़्यादा बढ़ी नहीं, बस थोड़ी-सी, मगर टाइप करते समय सिर सीधा रहा, झुकना नहीं पड़ा। कीबोर्ड अलग से नहीं था तो हाथ की पोज़िशन थोड़ी अजीब लगी शुरू में, पर धीरे-धीरे आदत हो गई।
उस रात क़रीब 1 घंटा हिसाब लिखा, पहले जितना गर्दन का भारीपन नहीं आया, ये सच है। कमर का मामला अलग है, वो अभी भी कुर्सी पर देर बैठने से टाइट हो जाती है, इस तरीके से उसमें कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ा। बेकरी का हिसाब और दुकान का हिसाब दोनों अलग-अलग रखने की आदत अभी नई-नई डाली है, तो देर तक बैठना फ़िलहाल टल नहीं रहा।
किताब-टिन का जुगाड़ ज़्यादा दिन टिकेगा नहीं, कभी एक असली स्टैंड ढूँढ के लाना पड़ेगा। अभी के लिए जो है उसी से काम चल रहा है।
