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जीवन का समय ›सीख की नोटबुक

हिसाब की किताब में एक तरीका मिला

दुकान का हिसाब 2 बारा लिखना शुरू किया तो पुरानी डायरी से कुछ समझ नहीं आया, इसलिए हिसाब पर एक किताब उठा ली। पूरी किताब अभी तक खत्म नहीं कर पाई, पर बीच के एक हिस्से ने दिमाग में अटका दिया।

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लेखक कह रहा था कि हर खर्च को अलग-अलग मत लिखो, बस दो हिस्सों में बांट दो — जो हर महीने तय है और जो मन से हुआ है। मैं अब तक सब कुछ एक ही कॉलम में डाल दिया करती थी, इसलिए महीने के आखिर में कुछ समझ ही नहीं आता था कि पैसा कहां गया।

आज से दुकान की कॉपी में भी वही दो हिस्से बना लिए हैं। ब्रेड के लिए आटा-मैदा खरीदना तय वाले में, और ग्राहक के लिए अचानक कुछ मंगाना मन वाले में। लिखते वक्त ही फर्क साफ दिखने लगा, यह पहले कभी समझ नहीं आया था।

शाम को गल्ला बंद करते वक्त कॉपी फिर से देखी तो थोड़ी राहत मिली जी, कम से कम अब पता चलता है कि पैसा किस तरफ जा रहा है। पीठ अभी भी झुक जाती है लिखते वक्त, वह आदत जल्दी जाने वाली नहीं लगती, पर हिसाब वाला हिस्सा थोड़ा हल्का लग रहा है।

कमेंट 1

  • फिटफाट10.30 21:58

    मैंने भी पहले सब खर्च एक साथ लिखा, महीने के अंत में कुछ समझ नहीं आता था जी

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