आज कारपेंटर वाले चाचा को कैलिपर से नाप लेते देखा।
हाथ बिल्कुल नहीं हिल रहा था, नज़र सिर्फ़ नाप पर टिकी हुई थी।

फ्रीलांस का काम कम चल रहा है इन दिनों, तो सुबह यूं ही टहलने निकल गई थी।
घर पर ब्रेड बनाते वक्त मैं भी आटा-पानी बहुत ध्यान से नापती हूं, वरना टेक्सचर बिगड़ जाता है।
शायद इसलिए रुक कर देखती रह गई।
खर्चे की डायरी भी फिर से लिखनी शुरू की है, वहां भी यही लगता है, हर छोटी चीज़ का हिसाब रखना कितना ज़रूरी है!
आपको भी कभी किसी और का काम देखकर अपना कुछ याद आता है क्या?
