आज ऑफिस से लौटते हुए रास्ते में थोड़ी सब्ज़ी और राजमा ले आई।
काउंटर पर जार सजाते हुए एक पल के लिए रुक गई।
दो हफ़्ते से रात का खाना ख़ुद बना रही हूँ, बच्चों के साथ बैठकर।
आज दफ़्तर में मीटिंग तीन घंटे चली थी, फिर भी घर आकर पहले रसोई में ही गई।
पहले ज़्यादातर ऑर्डर कर लेती थी, अब हाथ से कुछ बनाना ज़्यादा सुकून देता है, शायद ये सिर्फ़ मेरे लिए ऐसा हो।
छोटा राजमा-चावल के लिए मान जाता है, बड़ी को दाल ज़्यादा पसंद है।

कल सुबह भिगो कर रखूँगी, वीकेंड पर धीमी आँच पर पकाऊँगी।
काम का दिन कैसा भी रहे, ये दस मिनट अपने लिए निकाल लेती हूँ।
