टेबल पर नोटपैड और पेन यूं ही पड़े थे, आज सुबह देखा तो थोड़ी देर वहीं रुक गई
सुबह उठकर सीधे कुछ शुरू करने में अब वक्त लगता है, पहले जैसी ताकत जो नहीं रहती शरीर में
तो अब पहले लिस्ट बना लेती हूं, क्या पहले करना है क्या बाद में, वरना समझ ही नहीं आता कहां से हाथ लगाऊं
फ्रीलांस काम भी वैसा ही है, कभी बिल्कुल खाली रहता है कभी अचानक ढेर सारा आ जाता है
जब काम आता है तो यही नोटपैड याद दिलाता है कौन सा पहले भेजना है और कौन सा बाद में

बीच में घर की ब्रेड का हिसाब भी इसी में लिख देती हूं, आटा कब गूंधा कितनी देर रखा
मतलब अब सब कुछ फोन में नहीं, हाथ से लिखना ही ठीक लगता है, समझ भी ज्यादा आता है
आज बस यही टेबल दिखी तो फोटो खींच ली, कलम अभी भी वहीं पड़ी है
