सुबह करीब 7 बजे बच्चे को स्कूल छोड़ने जा रही थी।
रास्ते में वो खाली मैदान पड़ता है, आज उस पर नई सफेद लकीरें खिंची हुई थीं, बिल्कुल ताज़ी।
आसमान भरा हुआ था, बादल नीचे तक उतरे हुए।

पीछे छतें और पेड़ हल्के से दिख रहे थे।
2 मिनट के लिए बस वहीं रुक गई, कुछ खास सोचा नहीं फिर भी देखकर अच्छा लगा।
रात को सोना अब 1 बजे के बाद हो रहा है, पर सुबह की ये ठहरी हुई हवा कुछ मांगती नहीं, बस देख लेने भर से कुछ हल्का हो जाता है।
फिल्म कैमरे में एक फ्रेम बच गया था, वो यहीं खर्च कर दिया।
