ऑफिस से निकलते-निकलते रात के 9:40 बज गए थे।
बस स्टॉप तक जाते हुए ये इमारतें सामने से दिखीं।
रोशनी ऐसी थी कि थोड़ी देर के लिए फोन नीचे नहीं किया।
घर में दोनों बच्चे सो चुके होंगे, ये सोचते हुए भी पैर वहीं रुक गए।
2 मिनट ही खड़ी रही होंगी, पर उतनी देर में कुछ हल्का हुआ जैसा लगा।

आजकल सोने का टाइम भी पीछे खिसकता जा रहा है।
पहले 11 बजे तक लाइट बंद हो जाती थी, अब अक्सर 12:30 बज जाते हैं।
काम का स्ट्रेस शरीर पर कैसे दिखता है, ये पिछले कुछ हफ्तों में समझ आया है।
फिल्म कैमरा घर में रखा है, पर रात की रोशनी में उससे कुछ बनता नहीं, इसलिए फोन से ही यह लिया।
शायद मेरे साथ ही ऐसा हो, पर काम से लौटते हुए ऊपर देखना बहुत दिनों बाद हुआ।
बस यही शेयर करना था सबको।
