आज मेले में एक चाचा को मिट्टी के चाक पर बैठे देखा,
हाथ पूरी तरह मिट्टी में डूबे थे, और बर्तन धीरे-धीरे ऊपर उठता जा रहा था।
मुझे हमेशा लगता था इसके लिए हाथों में बहुत ताकत चाहिए,
पर पास खड़े होकर देखा तो पता चला, असली काम तो बस कलाई का हल्का दबाव है, ताकत की जरूरत तो बिल्कुल नहीं!
फ्रीलांस का काम आजकल थोड़ा ठंडा है, तो घर पर ब्रेड बना रही हूं और पुराना खाता-बही वाला हिसाब फिर से लिख रही हूं,
पर हाथों में जान न होने की वजह से नया कुछ छूने से मन थोड़ा हिचकता है।

चाक को यूं घूमते देखकर लगा, मतलब शुरुआत ताकत से नहीं, बस थोड़े धैर्य से होती है।
