पुरानी फ़ोटो छांटते हुए आज ये मिली।

फ़्रीलांसिंग तब भी करती थी, अभी भी करती हूं, बस शहर बदल गया है!
वो सुबह याद है, ट्रेन का इंतज़ार करते हुए लगता था अगला स्टॉप पता नहीं कहां ले जाएगा।
बिल्कुल वैसा ही लगता है जब कोई नया प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले होता है, कभी काम भर-भर के आता है तो कभी हफ़्तों कुछ नहीं।
उन दिनों प्लेटफ़ॉर्म पर खड़े रहना और अभी अगले काम का इंतज़ार करना, दोनों में फ़र्क नहीं लगता।
हिसाब-किताब वाली डायरी फिर से खोली है इन दिनों तो शायद इसी वजह से ये फ़ोटो आज याद आई!
आप लोगों का काम-धंधा आजकल कैसा चल रहा है, टिका हुआ है या मेरी तरह उतार-चढ़ाव वाला?
