← सूची

जीवन का समय ›आज की एक तस्वीर

[आसमान] पहाड़ों वाली बालकनी

आज सुबह काम में उलझी थी, एक के बाद एक मैसेज आ रहे थे।

Vibrant greenery and a mountain range beneath clear skies, View from a balcony with colourful flower

बीच में गमलों को पानी देने बालकनी पर गई, सामने पहाड़ बिल्कुल साफ दिख रहे थे।

इतना साफ आसमान यहाँ कम ही दिखता है।

2 मिनट वहीं खड़ी रह गई, कुछ सोचा भी नहीं बस देखती रही।

लौटकर काम वहीं का वहीं था, पर मन थोड़ा हल्का हो गया था, मतलब बस देखकर ही अच्छा लगा।

आप लोग काम के बीच में ऐसे कैसे रुकते हो, कुछ बताओ जी।

कमेंट 6

  • खुशबू09.05

    बालकनी वाला वो पल एकदम सही लगा। मैं भी पानी देने जाती हूँ तो कभी-कभी वहीं रुक जाती हूँ, पहाड़ देखकर मन [हल्का] हो जाता है

  • खुशबू09.06

    मेरे लिए इतना आसान नहीं है। बीच में रुकूं तो भी दिमाग में मैसेज घूमते रहते हैं, बाहर देख के [मन उतना हल्का नहीं होता] जितना आपने बताया। शायद पहाड़ जैसा बड़ा नज़ारा दिखे तभी फ़र्क पड़ता है, यहाँ तो बस दीवारें दिखती हैं।

  • → खुशबूमुस्कानलेखक09.06

    यहाँ भी बस दीवारें दिखती हैं, रोटी बेलते वक़्त कभी-कभी वैसा ही सुकून मिल जाता है

  • खुशबू09.06

    आसमान इतना साफ दिखे तो नज़र वहीं (ठहर) जाती है, मैं भी सुबह खिड़की से बादल देखकर कुछ देर रुक जाती हूं

  • खुशबू09.06

    5 मिनट का अलार्म लगा लेती हूं, बालकनी में खड़ी होकर बस सांस लेती हूं। बच्चों को स्कूल भेजने के बाद 9 बजे वाला यही एक ब्रेक होता है, वरना याद नहीं रहता रुकना है

  • खुशबू09.11

    काम के बीच में यूँ रुक जाना सच में मुश्किल होता है, हाथ में मैसेज पड़े रहते हैं और मन कहीं और भाग जाता है। मेरे साथ भी ऐसा हुआ था, बच्चों को स्कूल भेजने के बाद बालकनी में कपड़े सुखाने गई थी और वहीं थोड़ी देर खड़ी रह गई, आसमान उस दिन बिल्कुल साफ था। उस वक्त लगा था कि बस [देखते रहना] ही काफी है, और कुछ सोचने की जरूरत ही नहीं पड़ी। बाद में काम पर लौटी तो दिमाग थोड़ा शांत सा महसूस हुआ, वैसे ऐसा मौका

सभी पोस्ट देखें →