आज सुबह काम था नहीं तो बालकनी में कुर्सी खींच के बैठ गई…
सामने पहाड़ और ऊपर बिलकुल साफ आसमान, रेलिंग वाले गमले भी हरे भरे दिख रहे थे, वही जो कुछ हफ्ते पहले लगाए थे

खड़े होकर देर तक देखना अभी भी नहीं हो पाता तो बैठे बैठे ही देखती रही
फ्रीलांस का यही चक्कर है, कभी दिन भर फोन बजता रहता है और कभी ऐसे दिन जिसमें कुछ करने को नहीं होता, आज दूसरी वाली शिफ्ट थी
बस थोड़ी देर बैठी, गमलों में पानी डाला और अंदर आ गई
