आज रात काम में उलझी थी, बीच में बालकनी में गई थोड़ी हवा के लिए।
सामने वाली बिल्डिंग की लाइट्स एक के बाद एक जल रही थीं, आसमान भी हल्का नीला-काला हो रहा था।

पता नहीं क्यों बस वहीं खड़ी रह गई थोड़ी देर, कुछ सोचे बिना।
फ्रीलांस में यही होता है, कभी काम का पहाड़ होता है कभी बिल्कुल खाली बैठी रहती हूं, आज उसी पहाड़ के बीच का यह पल था।
बस इतना ही, कुछ खास नहीं था फिर भी अच्छा लगा।
