आज सुबह निकली तो सामने से साइकिल वालों की पूरी टोली गुज़री, सब ऑफिस की तरफ जा रहे थे।
एक जैसी रफ़्तार, एक जैसा रास्ता, देखकर अच्छा लगा।

फ्रीलांस में तो ऐसा कुछ फिक्स होता ही नहीं, कभी काम इतना कि सांस लेने की फुर्सत नहीं, कभी दिन भर कुछ नहीं।
बीच में सोचा था शरीर में थोड़ी ताकत लानी है, बस समझ नहीं आता कहां से शुरू करूं।
मतलब साइकिल देखकर पहली बार लगा शायद यही ठीक रहेगा, पर अभी पैडल पर पैर रखने की हिम्मत भी नहीं जुट रही।
बस रुककर देखती रही, सब कितनी आसानी से निकल गए।
