आज सुबह काम में गैप था तो बस निकल गई.
रास्ता एकदम खाली था, वही सफ़ेद तने वाले पेड़ और पत्तों की हल्की सरसराहट.
रास्ते में कोई नहीं मिला, बस मैं और पेड़ थे.
फ्रीलांस में यही चलता है, कभी 3 दिन कुछ काम नहीं आता, कभी रात 11 बजे तक बैठे रहो.
आज वाला दिन खाली निकला तो बस 40 मिनट चलती रही.

इतनी हरियाली में अकेले चलते हुए दिमाग सच में खाली हो जाता है, हिसाब-किताब भी थोड़ी देर के लिए भूल जाती हूं.
50 के बाद शरीर में मतलब ताकत नाम की चीज़ बची ही नहीं, कहाँ से शुरू करूं समझ नहीं आता.
चलना शायद पहला कदम है, है ना.
आप लोग खाली दिन में क्या करते हैं
