बिजली वाले की दकान में आज सुबह गई थी, पंखे का रेगुलेटर ठीक करवाने, तो कोने में यह मेज़ दिखी, पुराना वाइस कसा हुआ, एक ड्रिल मशीन रखी हुई, ईंट की दीवार पर सारे औज़ार करीने से टंगे हुए।
बरसों से वहीं मिस्त्री बैठता है, उससे यूं ही पूछ लिया तो बोला कि यह मेज़ उसके पिता के ज़माने की है, बस लकड़ी 2 बार बदली है, बाकी वैसी की वैसी।
हर औज़ार अपनी जगह पर टंगा था, ऐसी सफ़ाई देखकर अपनी हिसाब वाली डायरी याद आ गई जो अभी भी अस्त-व्यस्त पड़ी है, रात 11 बजे तक जागकर भी वो पूरी नहीं हो पाती।
अपनी नौकरी वाली फ़ाइलें और रिज़्यूमे का काम भी याद आ गया, पिछले 3 महीने से यहाँ-वहाँ फैला पड़ा है, ऐसी एक तय जगह अपने पास भी अभी तक नहीं बन पाई।

घर का सामान भी अक्सर सेकंड हैंड बाज़ार से ही जुटाती हूँ, सोचा वहीं से एक छोटी ड्रिल मशीन भी देख लूं, बेटे के काम आ जाएगी शायद।
