बेटे की स्कूटी ठीक करवाने मिस्त्री की दुकान गई थी, वहीं बगल में ये मेज़ नज़र आई। ईंट की दीवार से सटी हुई, ऊपर शिकंजा कसा हुआ, एक तरफ ड्रिल मशीन और कुछ पुराने औज़ार रखे थे, सब पर हल्की सी जंग जमी हुई।
देखकर वहीं 2 मिनट खड़ी रह गई, न जाने क्यों। घर में भी बिल्कुल ऐसी ही एक मेज है, सेकंड हैंड बाज़ार से 3 साल पहले लाई थी, तब से बस एक कोने में पड़ी है, न ठीक से इस्तेमाल हुई न कभी हटाई…

मिस्त्री से पूछा तो बोला ये सारे औज़ार बरसों पुराने हैं, पर अभी भी उतने ही काम के हैं, बस थोड़ी देखभाल चाहिए होती है। लौटते वक़्त रास्ते भर यही बात दिमाग़ में घूमती रही। रिज़्यूमे फिर से बना रही हू इन दिनों, कल रात भी 1 बजे तक यही सोचती रही, पुरानी चीज़ हो या पुराना हुनर, ठीक से सम्भाला जाए तो अभी भी चलता है, बस वक़्त और थोड़ा हौसला चाहिए होता है।
