आज रात लैंप की लाइट में डेस्क पर वही पुरानी बजट वाली किताब फिर निकाल ली।
पिछले 2 महीने से बंद पड़ी थी, आज उठाई तो पहला पेज ही अधूरा मिला।
मतलब, काम कम था तो हिसाब लिखने का मन ही नहीं हुआ, और काम ज़्यादा था तो टाइम ही नहीं मिला।
फ्रीलांस में ऐसा ही चलता है, कभी कुछ नहीं तो कभी सब एक साथ आ जाता है।
रात के करीब 10 बजे थे, घर में बाकी सब सो गए थे, बस लैंप जल रहा था और मैं पेज पलट रही थी।

पुराने महीनों का हिसाब देखा तो थोड़ी हैरानी हुई, कहां-कहां छोटे-छोटे खर्च जुड़ते चले गए, पता ही नहीं चला।
यानी, फिर से हर दिन एक लाइन लिखने की कोशिश करूंगी, देखते हैं कितने दिन चलता है!
बीच में उस रात ब्रेड भी बना ली थी, तो किताब के पन्ने पर आटे का हल्का निशान भी लगा हुआ है।
पुरानी आदत लौटाना अजीब लगता है, पर आज रात यही अच्छा लगा।
