मम्मी आज सलाइयां लेकर बैठ गईं, स्वेटर अभी आधा ही बना है।
ऊन का गोला बगल में पड़ा था, रंग देख के ही मन हल्का हो गया।

2 घंटे से वहीं बैठी हैं, हाथ रुकते ही नहीं, कितनी सफ़ाई से एक-एक लूप बनाती जाती हैं।
मेरे हाथ में तो अभी सुई पकड़ना भी ठीक से नहीं होता, बस बैठ के देखती रहती हूं।
कभी सोचती हूं मैं भी ऐसे कुछ बना पाऊंगी, अभी तो बस ताकत जुटाना ही काम है।
