आज बेटे के दफ़्तर कुछ पेपर देने गई थी, रिसेप्शन के पास एक मेज़ दिखी, ऊपर दो-तीन डायरी रखी थीं और एक गमले में छोटा सा पौधा, कोने से धूप आ रही थी, बड़ी शांत सी जगह लग रही थी।
मुझे नहीं पता क्यों पर वहीं रुक कर देखती रह गई, इतने सालों बाद अभी नौकरी के लिए बायोडाटा बना रही हूं, इस उम्र में भी मन कुछ नया शुरू करने का करता है, पहले शादी से पहले एक डायरी लिखती थी रोज़, फिर घर-गृहस्थी में वो भी छूट गया, बस डर भी लगता है कि पता नहीं अब कोई रखेगा भी या नहीं।

वो मेज़ देखकर लगा जैसे अपनी भी एक ऐसी मेज़ चाहिए, जहां रोज़ थोड़ी देर बैठ कर लिख सकूं, हिसाब-किताब भी और मन की बात भी, घर में तो अपने लिए कोना ही नहीं मिलता, हर जगह किसी न किसी का सामान रखा रहता है।
कल 9 बजे एक जगह इंटरव्यू के लिए बुलाया है, बाकी जो होगा देखा जाएगा।
