सुबह खिड़की से यही दिखा।
साइकिल पर दफ्तर जाती एक लड़की, बाल उड़ रहे थे।

घर से काम करते हुए अब सालों हो गए हैं।
पूरा दिन कुर्सी पर ही बीत जाता है, हिलना-डुलना लगभग बंद है।
आखिरी बार साइकिल 2 साल पहले चलाई थी, वो भी बच्चों के साथ पार्क में।
उसे दूर जाते देख बस यही सोचा – (थोड़ी हवा और चाहिए) मुझे भी।
