पुरानी अलमारी में यही किताब हाथ लग गई कल।
बहुत पहले खरीदी थी शरीर को हल्का-सा सक्रिय रखने के बारे में, फिर पढ़े बिना ऐसे ही रखी रह गई थी।

काम इन दिनों कम है तो सोचा फिर से पन्ने पलटूं, कहां से शुरू करूं ये अब भी ठीक से समझ नहीं आता, पर जहां तक पढ़ा वहां बुकमार्क लगाकर रख दिया है।
रोटी सेंकते वक्त भी यही ख्याल आता रहता है कि बस थोड़ा हिलना-डुलना शुरू करना है, बड़ा कुछ नहीं करना।
काम का दबाव आते ही दिन ऐसे निकल जाता है कि किताब भूल जाती है, फिर खाली समय में ही याद आती है।
